Wednesday 27 June 2012

कला के सामाजिक दायरे को बढ़ाते बाल रंग शिविर


कला के सामाजिक दायरे को बढ़ाते बाल रंग शिविर


सचिन श्रीवास्तव

अशोकनगर: पिछले कुछ दिनों में देश भर में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की विभिन्न इकाइयों ने 25 से अधिक बाल रंग शिविर का आयोजन किया। 20 दिन से लेकर एक महीने तक के इन शिविरों में ऐसा बहुत कुछ है कि इन्हें अपने आप में अनूठा, प्रयोगधर्मी, जरूरी और कला भविष्य के प्रति आश्वस्ति के रूप में देखा जा सकता है। कला और खासकर बच्चों के कलाकर्म को देखने का इधर जो नजरिया विकसित हुआ है, उसमें कुछ रियायतें और भावुकता भी शामिल होती है। इसलिए वे सच्चाइयां सामने नहीं आ पातीं, जो रंगशिविरों की अच्छाइयों और बुराइयों को नुमायां कर सकें। ज्यादातर मौकों पर बच्चों के थियेटर को आलोचना के बजाय आशीर्वाद की दृष्टि से देखा जा सकता है, क्या यह आने वाले दिनों के लिए खतरनाक हो सकता है? बहरहाल, अशोकनगर (मध्यप्रदेश) के आठवें बाल एवं रंग शिविर में 12 दिन गुजारने के साथ वे कारण साफ होते हैं, जो आने वाले दिनों के कस्बाई कला कर्म की रूपरेखा तय करने वाले हैं। कस्बों से कलाकारों का पलायन, संसाधनों की कमी, प्रतिबद्धता की छीजन और सार्वजनिक कला के द्वंद्व से जूझते हुए इप्टा की अशोकनगर ईकाई ने पहला रंग शिविर 1998 में लगाया था। बीच में कुछ व्यवधान के बाद बीते तीन साल से यह फिर लगातार जारी है।

एक मई 2012 को महानतम अभिनेता बलराज साहनी का शताब्दी वर्ष शुरू हुआ यह रंग शिविर उन्हीं के कला कर्म को समर्पित था। 25 दिनों के इस शिविर के उद्घाटन और समापन समारोह में बाल कलाकारों ने कुल तीन नाटकों, 2 नृत्य और पांच जनगीतों की प्रस्तुति दी। साथ ही अपने 25 दिन के रचनात्मक कार्यों, डायरी और शहर की समस्याओं पर रिपोर्टिंग पर आधारित 24 प्रष्ठीय अखबार ‘‘बाल रंग संवाद’’ प्रकाशित किया। इससे पहले उद्घाटन अवसर पर भी बच्चों ने नाटक ‘‘आदमखोर’’ का मंचन किया। कार्यशाला में व्यायाम, संगीत, क्राफ्ट, पत्रकारिता, नृत्य, रंगमंच, चित्रकला की सैद्धांतिक और प्रायोगिक जानकारी विषय विशेषज्ञों ने दी। यह जानकारियां उन बच्चों को दी गई हैं, जो आने वाले समय के कला जगत को अपने अपने ढंग से आलोकित करेंगे। बीज रूप में दिए गए कला-विचारों के वृक्ष कैसे होंगे, इसका अनुमान प्रस्तुतियों से लगाया जा सकता है।

उद्घाटन के अवसर पर श्री विजयदान देथा की कहानी ‘‘आदमखोर’’ के श्री रोहित झा द्वारा किए गए नाट्य रूपांतरण को युवा रंगकर्मी सत्यभामा ने मंच पर उतारा। खुद सत्यभामा के अलावा अविनाश तिवारी, विनय खान, ऋषभ श्रीवास्तव, सारांश पुरी और कबीर राजोरिया ने मंच पर अभिनय किया। इस पहली प्रस्तुति के साथ ही यह तय हो गया था कि नाट्य शिविर अपनी पिछली परंपराओं से अलग साबित होगा। यह पहली बार था जब अशोकनगर इप्टा की ईकाई ने शिविर के उद्घाटन पर नाटक की प्रस्तुति की। खासबात यह रही कि मंचन की पूरी जिम्मेदारी पिछले शिविर में शरीक रहे बच्चों ने ही निभाई।  संगीत की जिम्मेदारी सिद्धार्थ शर्मा ने निभाई और नेपथ्य के अन्य कार्य शिविरार्थी निवेदिता और संघमित्रा ने किए। प्रकाश संयोजन का कार्य इप्टा के वरिष्ठ सदस्य रतनलाल पटेल और श्याम वशिष्ठ ने किया।

दूसरे दिन बच्चों को व्यायाम, संगीत और नाटक के बारे में शुरुआती जानकारी दी गई। तीसरे दिन बच्चों ने पार्टीशन कहानी का पाठ किया, जिसके बारे में तय किया गया कि इसका मंचन किया जाएगा। नाट्य रूपांतरण की जिम्मेदारी प्रगतिशील लेखक संघ की गुना ईकाई के वरिष्ठ साथी सत्येंद्र रघुवंशी को दी गई। सात मई को महाकवि रबीन्द्रनाथ टैगोर के जन्मदिवस पर शिविर संयोजक रतनलाल पटेल ने उनकी रचनाओं का पाठ किया और बच्चों से श्री टैगोर के साहित्यिक योगदान की चर्चा की। दस मई को जबलपुर से लोकनृत्य विशेषज्ञ इंद्र पांडे का शिविर में आगमन हुआ। उन्होंने बच्चों को लोकनृत्य राई, दादारिया, पंथी और कालबेलिया के बारे में जानकारी थी। आगामी दिनों में बच्चों को उन्होंने इन चार नृत्यों का प्रशिक्षण दिया और समापन के अवसर पर दादरिया और राई का प्रदर्शन किया गया। 16 मई को उज्जैन से आए ख्यातिलब्ध चित्रकार मुकेश बिजौले ने बच्चों को चित्रकला की जानकारी दी। उन्होंने बच्चों को आधुनिक चित्रकला की सैद्धांतिक और प्रायोगिक जानकारी दी।  बाद के दिनों में बच्चों ने खुद चित्र बनाए, जिनमें से चुनिंदा चित्रों को बाल रंग संवाद के अंक में प्रकाशित किया गया। 17 मई को मेरठ से आए युवा पत्रकार सचिन श्रीवास्तव ने बच्चों को पत्रकारिता के बारे में जानकारी दी। अशोकनगर ईकाई ने 2010 के शिविर में पहली बार 8 पन्ने का अखबार ‘‘बाल रंग संवाद’’ प्रकाशित किया था। 2011 में यह 20 पन्ने में प्रकाशित हुआ और इस बार 24 पन्ने का अखबार प्रकाशित किया गया। बीते दो अंकों के बजाय इस बार बच्चों ने शहर की समस्याओं पर रिपोर्टिंग की। इस बीच बच्चें प्रतिदिन डायरी भी लिख रहे थे, जिसे ‘‘बाल रंग संवाद’’ में शामिल किया गया। 20 मई को बीना से आए गजलकार श्री महेश कटारे ने बच्चों के बीच अपनी बुंदेली गजलों का पाठ किया। जिसके बारे में बच्चों ने अपनी डायरी में प्रतिक्रिया दी।

25 मई को हुए समापन समारोह की शुरुआत गजलकार श्री महेश कटारे, प्रलेस गुना के वरिष्ठ साथी श्री रामलखन भट्ट, वरिष्ठ पत्रकार श्री मनोज जैन और इप्टा के प्रदेश महासचिव श्री हरिओम राजोरिया के सानिध्य में ‘‘बाल रंग संवाद’’ के लोकार्पण से हुई। इसके बाद शिविर संयोजक रतनलाल पटेल और रामदुलारी शर्मा के मार्गदर्शन में तैयार जनगीतों की प्रस्तुति हुई। इसके बाद ईवा भार्गव, अणिमा जैन, रक्षिता जैन, मानसी जैन, सुरभि जैन, चारू जैन, स्नेहा गुप्ता और साक्षी पांडे ने ‘‘दादरिया’’ लोकनृत्य की प्रस्तुति दी। इंद्र पांडे, रतन लाल पटेल और सिद्धार्थ शर्मा ने थाप दी।

इसके बाद अशोकनगर इप्टा की वरिष्ठ साथी और वर्तमान शिविर की संयोजक सीमा राजोरिया के निर्देशन में स्वयं प्रकाश की कहानी ‘‘पार्टीशन’’ के सत्येंद्र रघुवंशी द्वारा तैयार नाट्य आलेख का मंचन किया गया। नाटक की कहानी एक प्रगतिशील मुसलिम व्यापारी कुरबान अली के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक झगड़े में जलील होने के बाद इंसान से मुसलमान ठहरा दिया जाता है। कुरबाल अली के रूप में सत्यभामा ने अपने भावुक अभिनय से दर्शकों को बांधे रखा, तो लतीफ मियां के किरदार में कबीर राजोरिया ने अपनी संवाद अदायगी के बूते अलग छाप छोड़ी। ईमान अली के किरदार को बाल कलाकार अमित गुप्ता ने बिल्कुल पड़ोस का बना दिया और अमन खान ने प्रोफेसर के पात्र को जीवंत बनाया। रऊफ के रूप में ऋषभ श्रीवास्तव, शायर-कवि शिवानी शर्मा, भाई जी और दरोगा अनुपम तिवारी, गोटू का पात्र अखिल जैन ने बेहतरीन ढंग से निभाया। अन्य कलाकारों ने भी अपने छोटे-छोटे किरदार को खूबसूरती से अदा किया।

खासबात यह रही कि नाटक में कोई भी पात्र हावी नहीं रहा। नाटक अपनी पूरी जटिलताओं के साथ जरूरी संदेश देने में कामयाब रहा। तालियां कम बजीं, लेकिन जहां बजनी चाहिए थीं, वहीं बजीं। यह निर्देशक की भी कामयाबी थी, और कलाकारों की भी। खासकर कुरबान अली के एक लंबे संवाद में, जब वह अपने इंसान होने और मुसलमान होने के बीच की टकराहट को सामने रखता है, दर्शकों में लंबा सन्नाटा था। नाटक में हास्य का पुट नहीं था, और बच्चों के साथ पूरी गंभीरता दिखाते हुए दर्शकों ने कहानी को आत्मसात किया। करीब सवा घंटे के इस नाटक में 12 दृश्य थे, और हरएक में प्रापर्टी को बदलना था, जिसे बच्चों ने खूबसूरती से अंजाम दिया। मुकेश बिजौले, आकांक्षा, अर्चना प्रसाद और संजय माथुर के मेकअप ने नाटक की खूबसूरती को तो बढ़ाया ही, भाव और किरदार दर्शाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रकाश संयोजन रतनलाल और श्याम वशिष्ठ का था।

दूसरा नाटक व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की कहानी ‘‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’’ के तपन बनर्जी द्वारा किए गए नाट्य रूपांतरण पर आधारित था। इसका निर्देशन विनोद शर्मा ने किया, निर्देशन में सहयोग किया रामबाबू कुशवाह ने। नुक्कड़ शैली के इस नाटक में मातादीन की प्रमुख भूमिका के साथ आर्यन अरोरा ने ईमानदार व्यवहार किया और उनका साथ दिया, विनय खान, प्रियांशु शेखर, दर्श दुबे, अनिकेत, आशीष, सौरभ और कबीर खान ने। अभिनय के लिहाज से आर्यन और प्रियांशु ने दर्शकों की वाहवाही बटोरी। प्रापर्टी की कमी के बावजूद कलाकारों ने चांद के दृश्य और पुलिस की कार्यप्रणाली को खूबसूरती से बेपर्दा किया। संवादों में तीक्ष्णता अपने पूरे वेग से हाॅल में पहुंच रही थी, जिसका सबूत बीच-बीच में उठा रहे ठहाके थे।

दोनों नाटकों के बीच के अंतराल में दीक्षा जैन, श्वास्ती, संघमित्रा, प्रज्ञा, पारूल, कविता, प्रियंका, सौम्या, आशी और आस्था ने बुंदेलखंड के लोकनृत्य ‘‘राई’’ की प्रस्तुति दी। ‘‘राई’’ के गंभीर दर्शकों ने भी इसकी सराहना की और एक दर्शक की यह टिप्पणी नृत्य की तारीफ के लिए काफी है कि, ‘‘हम चाहते थे कि यह नृत्य पूरी रात चलता रहे।’’ वैसे भी ‘‘राई’’ नृत्य अपने पारंपरिक रूप में पूरी रात चलता है,  यह बच्चे की पैदाइश और विवाह के अवसर पर होता है, जिसे मिथक में लव-कुश की पैदाइश से जोड़कर देखा जाता है। समापन समारोह के अंत में पीडब्ल्यूडी के एसडीओ श्री ज्ञानवर्धन मिश्रा, वरिष्ठ कवि निरंजन श्रोत्रिय, वरिष्ठ पत्रकार अतुल लुंबा और गजलकार महेश कटारे ने बच्चों को सुनहरे भविष्य की उम्मीदों के साथ प्रमाण-पत्र वितरित किए गए। इस लंबे किंतु बेहद सधे हुए कार्यक्रम का संचालन ख्यातिलब्ध चित्रकार और अशोकनगर इप्टा के वरिष्ठ साथी पंकज दीक्षित ने किया। शिविर के सफल संचालन में संयोजक और इप्टा अशोकनगर की अध्यक्ष सीमा राजोरिया, सचिव राकेश विश्वकर्मा के अलावा वरिष्ठ साथी विनोद शर्मा और रतनलाल पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

इस रंग शिविर से कला कर्म के भविष्य की जो तस्वीर सामने आती है, वह किसी नाट्य क्रांति को रेखांकित नहीं करती, लेकिन कला के सामाजिक दायरे को बढ़ाती है। अच्छे और बुरे के फर्क की तमीज पैदा करने वाले शिविरों में इप्टा के इस शिविर को अलग से रेखांकित भले न किया जाए, लेकिन इसे खारिज नहीं किया जा सकता। यह तब है जब अशोकनगर जैसे शहर बनते कस्बे में इसी दरम्यान क्रिकेट से लेकर आधुनिक नृत्य तक की कार्यशालाएं समानांतर रूप से चल रही थीं। ऐसे में 60 से अधिक बच्चे हर साल तपती धूप में नाट्य कर्म और कुछ अन्य जरूरी कलाओं का प्रशिक्षण ले रहे हैं, तो आश्वस्त हुआ जा सकता है कि कस्बों में थियेटर बचाने के लिए किसी सरकारी पहल की जरूरत नहीं है। इस कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार श्री अतुल लुंबा ने कहा था कि ‘‘अशोकनगर में बच्चों के थियेटर पर जो काम हो रहा है, उसकी पहचान प्रदेश ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर हो रही है।’’ दिलचस्प है कि राष्ट्रीय सवाल भी कस्बों तक पहुंच रहे हैं, इसलिए यह जरूरी भी है कि कस्बे राष्ट्रीय फलक पर जवाबदेही निभाएं। इस लिहाज से अशोकनगर का कला जगत अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे भिलाई से लेकर डोंगरगढ़ तक के अन्य समूह अपने-अपने ढंग से हस्तक्षेप कर रहे हैं।

भड़ास4मीडिया से साभार

Tuesday 26 June 2012

सामाजिक दायरे को बढ़ाते बाल रंग शिविर


 सामाजिक दायरे को बढ़ाते बाल रंग शिविर


सचिन श्रीवास्तव

अशोकनगर: पिछले कुछ दिनों में देश भर में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की विभिन्न इकाइयों ने 25 से अधिक बाल रंग शिविर का आयोजन किया। 20 दिन से लेकर एक महीने तक के इन शिविरों में ऐसा बहुत कुछ है कि इन्हें अपने आप में अनूठा, प्रयोगधर्मी, जरूरी और कला भविष्य के प्रति आश्वस्ति के रूप में देखा जा सकता है। कला और खासकर बच्चों के कलाकर्म को देखने का इधर जो नजरिया विकसित हुआ है, उसमें कुछ रियायतें और भावुकता भी शामिल होती है। इसलिए वे सच्चाइयां सामने नहीं आ पातीं, जो रंगशिविरों की अच्छाइयों और बुराइयों को नुमायां कर सकें। ज्यादातर मौकों पर बच्चों के थियेटर को आलोचना के बजाय आशीर्वाद की दृष्टि से देखा जा सकता है, क्या यह आने वाले दिनों के लिए खतरनाक हो सकता है? बहरहाल, अशोकनगर (मध्यप्रदेश) के आठवें बाल एवं रंग शिविर में 12 दिन गुजारने के साथ वे कारण साफ होते हैं, जो आने वाले दिनों के कस्बाई कला कर्म की रूपरेखा तय करने वाले हैं। कस्बों से कलाकारों का पलायन, संसाधनों की कमी, प्रतिबद्धता की छीजन और सार्वजनिक कला के द्वंद्व से जूझते हुए इप्टा की अशोकनगर ईकाई ने पहला रंग शिविर 1998 में लगाया था। बीच में कुछ व्यवधान के बाद बीते तीन साल से यह फिर लगातार जारी है।

एक मई 2012 को महानतम अभिनेता बलराज साहनी का शताब्दी वर्ष शुरू हुआ यह रंग शिविर उन्हीं के कला कर्म को समर्पित था। 25 दिनों के इस शिविर के उद्घाटन और समापन समारोह में बाल कलाकारों ने कुल तीन नाटकों, 2 नृत्य और पांच जनगीतों की प्रस्तुति दी। साथ ही अपने 25 दिन के रचनात्मक कार्यों, डायरी और शहर की समस्याओं पर रिपोर्टिंग पर आधारित 24 प्रष्ठीय अखबार ‘‘बाल रंग संवाद’’ प्रकाशित किया। इससे पहले उद्घाटन अवसर पर भी बच्चों ने नाटक ‘‘आदमखोर’’ का मंचन किया। कार्यशाला में व्यायाम, संगीत, क्राफ्ट, पत्रकारिता, नृत्य, रंगमंच, चित्रकला की सैद्धांतिक और प्रायोगिक जानकारी विषय विशेषज्ञों ने दी। यह जानकारियां उन बच्चों को दी गई हैं, जो आने वाले समय के कला जगत को अपने अपने ढंग से आलोकित करेंगे। बीज रूप में दिए गए कला-विचारों के वृक्ष कैसे होंगे, इसका अनुमान प्रस्तुतियों से लगाया जा सकता है।

उद्घाटन के अवसर पर श्री विजयदान देथा की कहानी ‘‘आदमखोर’’ के श्री रोहित झा द्वारा किए गए नाट्य रूपांतरण को युवा रंगकर्मी सत्यभामा ने मंच पर उतारा। खुद सत्यभामा के अलावा अविनाश तिवारी, विनय खान, ऋषभ श्रीवास्तव, सारांश पुरी और कबीर राजोरिया ने मंच पर अभिनय किया। इस पहली प्रस्तुति के साथ ही यह तय हो गया था कि नाट्य शिविर अपनी पिछली परंपराओं से अलग साबित होगा। यह पहली बार था जब अशोकनगर इप्टा की ईकाई ने शिविर के उद्घाटन पर नाटक की प्रस्तुति की। खासबात यह रही कि मंचन की पूरी जिम्मेदारी पिछले शिविर में शरीक रहे बच्चों ने ही निभाई।  संगीत की जिम्मेदारी सिद्धार्थ शर्मा ने निभाई और नेपथ्य के अन्य कार्य शिविरार्थी निवेदिता और संघमित्रा ने किए। प्रकाश संयोजन का कार्य इप्टा के वरिष्ठ सदस्य रतनलाल पटेल और श्याम वशिष्ठ ने किया।

दूसरे दिन बच्चों को व्यायाम, संगीत और नाटक के बारे में शुरुआती जानकारी दी गई। तीसरे दिन बच्चों ने पार्टीशन कहानी का पाठ किया, जिसके बारे में तय किया गया कि इसका मंचन किया जाएगा। नाट्य रूपांतरण की जिम्मेदारी प्रगतिशील लेखक संघ की गुना ईकाई के वरिष्ठ साथी सत्येंद्र रघुवंशी को दी गई। सात मई को महाकवि रबीन्द्रनाथ टैगोर के जन्मदिवस पर शिविर संयोजक रतनलाल पटेल ने उनकी रचनाओं का पाठ किया और बच्चों से श्री टैगोर के साहित्यिक योगदान की चर्चा की। दस मई को जबलपुर से लोकनृत्य विशेषज्ञ इंद्र पांडे का शिविर में आगमन हुआ। उन्होंने बच्चों को लोकनृत्य राई, दादारिया, पंथी और कालबेलिया के बारे में जानकारी थी। आगामी दिनों में बच्चों को उन्होंने इन चार नृत्यों का प्रशिक्षण दिया और समापन के अवसर पर दादरिया और राई का प्रदर्शन किया गया। 16 मई को उज्जैन से आए ख्यातिलब्ध चित्रकार मुकेश बिजौले ने बच्चों को चित्रकला की जानकारी दी। उन्होंने बच्चों को आधुनिक चित्रकला की सैद्धांतिक और प्रायोगिक जानकारी दी।  बाद के दिनों में बच्चों ने खुद चित्र बनाए, जिनमें से चुनिंदा चित्रों को बाल रंग संवाद के अंक में प्रकाशित किया गया। 17 मई को मेरठ से आए युवा पत्रकार सचिन श्रीवास्तव ने बच्चों को पत्रकारिता के बारे में जानकारी दी। अशोकनगर ईकाई ने 2010 के शिविर में पहली बार 8 पन्ने का अखबार ‘‘बाल रंग संवाद’’ प्रकाशित किया था। 2011 में यह 20 पन्ने में प्रकाशित हुआ और इस बार 24 पन्ने का अखबार प्रकाशित किया गया। बीते दो अंकों के बजाय इस बार बच्चों ने शहर की समस्याओं पर रिपोर्टिंग की। इस बीच बच्चें प्रतिदिन डायरी भी लिख रहे थे, जिसे ‘‘बाल रंग संवाद’’ में शामिल किया गया। 20 मई को बीना से आए गजलकार श्री महेश कटारे ने बच्चों के बीच अपनी बुंदेली गजलों का पाठ किया। जिसके बारे में बच्चों ने अपनी डायरी में प्रतिक्रिया दी।

25 मई को हुए समापन समारोह की शुरुआत गजलकार श्री महेश कटारे, प्रलेस गुना के वरिष्ठ साथी श्री रामलखन भट्ट, वरिष्ठ पत्रकार श्री मनोज जैन और इप्टा के प्रदेश महासचिव श्री हरिओम राजोरिया के सानिध्य में ‘‘बाल रंग संवाद’’ के लोकार्पण से हुई। इसके बाद शिविर संयोजक रतनलाल पटेल और रामदुलारी शर्मा के मार्गदर्शन में तैयार जनगीतों की प्रस्तुति हुई। इसके बाद ईवा भार्गव, अणिमा जैन, रक्षिता जैन, मानसी जैन, सुरभि जैन, चारू जैन, स्नेहा गुप्ता और साक्षी पांडे ने ‘‘दादरिया’’ लोकनृत्य की प्रस्तुति दी। इंद्र पांडे, रतन लाल पटेल और सिद्धार्थ शर्मा ने थाप दी।

इसके बाद अशोकनगर इप्टा की वरिष्ठ साथी और वर्तमान शिविर की संयोजक सीमा राजोरिया के निर्देशन में स्वयं प्रकाश की कहानी ‘‘पार्टीशन’’ के सत्येंद्र रघुवंशी द्वारा तैयार नाट्य आलेख का मंचन किया गया। नाटक की कहानी एक प्रगतिशील मुसलिम व्यापारी कुरबान अली के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक झगड़े में जलील होने के बाद इंसान से मुसलमान ठहरा दिया जाता है। कुरबाल अली के रूप में सत्यभामा ने अपने भावुक अभिनय से दर्शकों को बांधे रखा, तो लतीफ मियां के किरदार में कबीर राजोरिया ने अपनी संवाद अदायगी के बूते अलग छाप छोड़ी। ईमान अली के किरदार को बाल कलाकार अमित गुप्ता ने बिल्कुल पड़ोस का बना दिया और अमन खान ने प्रोफेसर के पात्र को जीवंत बनाया। रऊफ के रूप में ऋषभ श्रीवास्तव, शायर-कवि शिवानी शर्मा, भाई जी और दरोगा अनुपम तिवारी, गोटू का पात्र अखिल जैन ने बेहतरीन ढंग से निभाया। अन्य कलाकारों ने भी अपने छोटे-छोटे किरदार को खूबसूरती से अदा किया।

खासबात यह रही कि नाटक में कोई भी पात्र हावी नहीं रहा। नाटक अपनी पूरी जटिलताओं के साथ जरूरी संदेश देने में कामयाब रहा। तालियां कम बजीं, लेकिन जहां बजनी चाहिए थीं, वहीं बजीं। यह निर्देशक की भी कामयाबी थी, और कलाकारों की भी। खासकर कुरबान अली के एक लंबे संवाद में, जब वह अपने इंसान होने और मुसलमान होने के बीच की टकराहट को सामने रखता है, दर्शकों में लंबा सन्नाटा था। नाटक में हास्य का पुट नहीं था, और बच्चों के साथ पूरी गंभीरता दिखाते हुए दर्शकों ने कहानी को आत्मसात किया। करीब सवा घंटे के इस नाटक में 12 दृश्य थे, और हरएक में प्रापर्टी को बदलना था, जिसे बच्चों ने खूबसूरती से अंजाम दिया। मुकेश बिजौले, आकांक्षा, अर्चना प्रसाद और संजय माथुर के मेकअप ने नाटक की खूबसूरती को तो बढ़ाया ही, भाव और किरदार दर्शाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रकाश संयोजन रतनलाल और श्याम वशिष्ठ का था।

दूसरा नाटक व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की कहानी ‘‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’’ के तपन बनर्जी द्वारा किए गए नाट्य रूपांतरण पर आधारित था। इसका निर्देशन विनोद शर्मा ने किया, निर्देशन में सहयोग किया रामबाबू कुशवाह ने। नुक्कड़ शैली के इस नाटक में मातादीन की प्रमुख भूमिका के साथ आर्यन अरोरा ने ईमानदार व्यवहार किया और उनका साथ दिया, विनय खान, प्रियांशु शेखर, दर्श दुबे, अनिकेत, आशीष, सौरभ और कबीर खान ने। अभिनय के लिहाज से आर्यन और प्रियांशु ने दर्शकों की वाहवाही बटोरी। प्रापर्टी की कमी के बावजूद कलाकारों ने चांद के दृश्य और पुलिस की कार्यप्रणाली को खूबसूरती से बेपर्दा किया। संवादों में तीक्ष्णता अपने पूरे वेग से हाॅल में पहुंच रही थी, जिसका सबूत बीच-बीच में उठा रहे ठहाके थे।

दोनों नाटकों के बीच के अंतराल में दीक्षा जैन, श्वास्ती, संघमित्रा, प्रज्ञा, पारूल, कविता, प्रियंका, सौम्या, आशी और आस्था ने बुंदेलखंड के लोकनृत्य ‘‘राई’’ की प्रस्तुति दी। ‘‘राई’’ के गंभीर दर्शकों ने भी इसकी सराहना की और एक दर्शक की यह टिप्पणी नृत्य की तारीफ के लिए काफी है कि, ‘‘हम चाहते थे कि यह नृत्य पूरी रात चलता रहे।’’ वैसे भी ‘‘राई’’ नृत्य अपने पारंपरिक रूप में पूरी रात चलता है,  यह बच्चे की पैदाइश और विवाह के अवसर पर होता है, जिसे मिथक में लव-कुश की पैदाइश से जोड़कर देखा जाता है। समापन समारोह के अंत में पीडब्ल्यूडी के एसडीओ श्री ज्ञानवर्धन मिश्रा, वरिष्ठ कवि निरंजन श्रोत्रिय, वरिष्ठ पत्रकार अतुल लुंबा और गजलकार महेश कटारे ने बच्चों को सुनहरे भविष्य की उम्मीदों के साथ प्रमाण-पत्र वितरित किए गए। इस लंबे किंतु बेहद सधे हुए कार्यक्रम का संचालन ख्यातिलब्ध चित्रकार और अशोकनगर इप्टा के वरिष्ठ साथी पंकज दीक्षित ने किया। शिविर के सफल संचालन में संयोजक और इप्टा अशोकनगर की अध्यक्ष सीमा राजोरिया, सचिव राकेश विश्वकर्मा के अलावा वरिष्ठ साथी विनोद शर्मा और रतनलाल पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

इस रंग शिविर से कला कर्म के भविष्य की जो तस्वीर सामने आती है, वह किसी नाट्य क्रांति को रेखांकित नहीं करती, लेकिन कला के सामाजिक दायरे को बढ़ाती है। अच्छे और बुरे के फर्क की तमीज पैदा करने वाले शिविरों में इप्टा के इस शिविर को अलग से रेखांकित भले न किया जाए, लेकिन इसे खारिज नहीं किया जा सकता। यह तब है जब अशोकनगर जैसे शहर बनते कस्बे में इसी दरम्यान क्रिकेट से लेकर आधुनिक नृत्य तक की कार्यशालाएं समानांतर रूप से चल रही थीं। ऐसे में 60 से अधिक बच्चे हर साल तपती धूप में नाट्य कर्म और कुछ अन्य जरूरी कलाओं का प्रशिक्षण ले रहे हैं, तो आश्वस्त हुआ जा सकता है कि कस्बों में थियेटर बचाने के लिए किसी सरकारी पहल की जरूरत नहीं है। इस कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार श्री अतुल लुंबा ने कहा था कि ‘‘अशोकनगर में बच्चों के थियेटर पर जो काम हो रहा है, उसकी पहचान प्रदेश ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर हो रही है।’’ दिलचस्प है कि राष्ट्रीय सवाल भी कस्बों तक पहुंच रहे हैं, इसलिए यह जरूरी भी है कि कस्बे राष्ट्रीय फलक पर जवाबदेही निभाएं। इस लिहाज से अशोकनगर का कला जगत अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे भिलाई से लेकर डोंगरगढ़ तक के अन्य समूह अपने-अपने ढंग से हस्तक्षेप कर रहे हैं।

भड़ास4मीडिया से साभार

Tuesday 15 May 2012

nayaa jamaanaa

जनसत्ता अपनी प्रगतिशीलता विरोधी मुहिम में एक कदम आगे बढ़ गया है. उसने के.विक्रम राव का जनसत्ता के 13मई 2012 के अंक में "न प्रगति न जनवाद, निपट अवसरवाद" शीर्षक से लेख छापा है। यह लेख प्रगतिशील लेखकों और समाजवाद के प्रति पूर्वाग्रहों से भरा है। 

यह सच है राव साहब की लोकतंत्र में आस्थाएं हैं लेकिन उनके लोकतंत्र में प्रगतिशील लेखकों के लिए कोई जगह नहीं है। प्रगतिशील लेखकों की भूमिका पर राव का मानना है "आज के कथित प्रगतिवादी इसी दोयम दर्जे में आते हैं।" यही उनके लेख की आधारभूत धारणा है । यही उनके साहित्य-विवेक का पैमाना भी है। 

राव साहब के लिखे को देखकर यही लगता है कि इनको प्रगतिशील साहित्य का कोई ज्ञान नहीं है अथवा ये जान-बूझकर झूठ बोल रहे हैं। विक्रमराव साहब कम से कम यह तो बताएं कि आधुनिक साहित्य के खासकर नए युग के लोकतांत्रिक प्रतिवादी लेखन के कविता, कहानी,उपन्यास आदि में जो मानक प्रगतिशील-जनवादी लेखकों ने बनाए क्या वे अन्य किसी ने बनाए हैं ? 

राव साहब के इस लेख की एक बड़ी दिक्कत है कि यहां तथ्य की बजाय असत्य के आधार पर विचारों की जलेवी बनायी गयी है। प्रगतिशील साहित्य यदि अवसरवादी साहित्य होता और प्रगतिशील लेखक अवसरवादी होते तो प्रगतिशील लेखकों के घरों में घी के दीपक जल रहे होते। 

साहित्य में अवसरवाद का अर्थ है प्रतिवादी साहित्य की मौत। विक्रमराव साहब आप ही बताएं कि जगदीश चन्द्र के "धरती धन न अपना" से लेकर भीष्म साहनी के "तमस" तक लेखन में कहां पर अवसरवाद है ? आप जानते हैं कि लेखक की पहचान उसके लिखे के आधार पर होनी चाहिए न कि बयानबाजी के आधार पर। आपातकाल में प्रगतिशील आंदोलन के पुरोधाओं केदारनाथ अग्रवाल,परसाई आदि ने साहित्य धरातल पर आपात्काल का प्रतिवाद भी किया था। उनकी रचनाएं उपलब्ध हैं। मंगाकर पढ़ लें। 

राव साहब,जलेबी सुख के लिए काहे को प्रगतिशील विरोधी अंध प्रौपैगैण्डा के आधार पर अनर्गल लिख रहे हैं ? अनर्गल और असत्य लेखन को विचार नहीं कहते,जलेबीलेखन को कभी साहित्य या पत्रकारिता का दर्जा नहीं मिला है। राव साहब आपने जो लेख लिखा है वह पत्रकारिता नहीं है, बल्कि एक अदने से संपादक के लेख की हिमायत में लिखा भौंड़ा और आधारहीन लेखन जलेबी लेखन है। कम से कम राव जैसे प्रतिष्ठित लेखक-पत्रकार से हम यह उम्मीद तो करते हैं कि वह अपने संपादक की डिफेंस में न लिखे। संपादक की डिफेंस में असत्य लेखन पत्रकारिता का पतन है। यह दरबारी लेखन है। इसे आजकल की भाषा में पेड लेखन भी कहते हैं। 

संपादक की इच्छा पर उगले गए राव साहब के विचार इस बात की सूचना भी देते हैं कि हिन्दी पत्रकारिता का आदर्श अखबार नपुंसक –जलेबी पत्रकारिता में मशगूल हो गया है और उसके संपादक को अपने विचारों की डिफेंस में आदेश पर लिखवाना पड़ रहा है। आदेश पर जलेबी हलवाई लिखते है, पत्रकार नहीं। 

राव साहब की चरम आकांक्षा है कि "इन प्रगतिवादियों को सोवियत संघ की मृत्यु के बाद स्वयं गुम हो जाना चाहिए था।" राव आप साहब देख रहे हैं सारी दुनिया में कम्युनिस्ट मरे नहीं हैं। भारत में भी मरे नहीं हैं। काहे को इतनी व्यथा झेल रहे हैं अंध –कम्युनिस्ट विरोध के आधार पर।यह कम्युनिस्ट कुण्ठा है। यह अनेक की नींद ले चुकी है।आपको भी यह ग्रंथि कष्ट दे रही है लेकिन अफसोस है कि हम इस मामले में कोई मदद नहीं कर सकते। जनसत्ता के संपादक के पास में भी इसका कोई लाज नहीं है। कुण्ठाएं अनुदार नजरिए का चरम होती हैं। प्लीज जलेबी खाना बंद कर दीजिए आपको राहत मिल जाएगी।दूसरी बात यह कि कम्युनिस्ट या प्रगतिशील लेखक मरने वाले नहीं हैं। शोषण जब तक रहेगा प्रगतिशील रहेंगे,कम्युनिस्ट भी रहेंगे और सामाजिक परिवर्तन का साम्यवादी विश्ववदृष्टिकोण भी रहेगा। 

विक्रम राव का मानना है, "भारतीय समाज के साथ दशकों तक धोखाधड़ी करने के प्रायश्चित के तौर पर ही सही, जनवाद का चोला पहनने वालों को इतिहास के नेपथ्य में चला जाना चाहिए था।" राव साहब आप ही बताएं कि कम्युनिस्टों ने और खासकर प्रगतिशील-जनवादी लेखकों ने आम जनता के साथ कौन सी धोखाधड़ी की है ? हिन्दी के अधिकांश प्रगतिशील लेखक (चाहे वो किसी भी दल में हों) मौटे तौर पर यथाशक्ति जनता के संघर्षों का समर्थन करते रहे हैं। प्रतिवाद की बेला में यदि कभी किसी के कदम इधर-उधर बहके भी हैं तो अंत में बहके हुए लोग भी सही दिशा में कदम उठाते नजर आए हैं। 

किसी भी लेखक के बारे में या आंदोलन के बारे में समग्रता में बातें की जानी चाहिए। दूसरी बात यह कि बद-दुआएं ,लेखन नहीं है।उसी तरह दुआएं भी लेखन नहीं है।यह जलेबी लेखन है। राव साहब आपके पास प्रगतिशीलों के प्रति बद-दुआओं का वह खजाना है जिसे शीतयुद्धीय राजनीति के दौरान अमेरिकी कलमवीरों ने कमाल दिखाते हुए इजाद किया था। आप भारत में रहते हैं अमेरिका में नहीं। कम से कम भारत की हकीकत तो देखकर बातें करें। भारत की आज जो दुर्दशा है उसके लिए न तो कम्युनिस्ट जिम्मेदार हैं और न प्रगतिशील ही जिम्मेदार हैं, ये लोग भारत में शासन नहीं चलाते,इनका इस देश की नीतियों के निर्माण में भी बहुत कम योगदान है,फिर इनके ऊपर इतना गुस्सा क्यों ? 

राव साहब ,जनवाद को बुर्जुआजी और उसके आप जैसे हमदर्द जलेबी लेखकों ने बंधक बनाया हुआ है। जनवादी-प्रगतिशील लेखक अपनी कलम से यथाशक्ति इसके खिलाफ संघर्ष करते रहते हैं। वे संघर्ष इसलिए नहीं करते कि उनको कोई इनाम मिले। वे इसलिए भी नहीं लिखते कि उनको शोहरत मिले। वे तो हृदय के आदेश पर लिखते हैं। 

राव साहब, जरा कभी अपने हृदय के आदेश पर लिखें और सोचें तो संभवतःप्रगतिशील-जनवादी लेखकों के प्रति आपके मन में जो घृणा बैठी है वह कुछ कम हो जाए ? राव साहब बूढ़े तोते को सिखाया नहीं जा सकता, फिर भी यही कहेंगे कि लेखक और लेखन पर (चाहे वो किसी भी विचारधारा को मानते हों) पर घृणा और असत्य के आधार पर नहीं सोचना चाहिए। एक सम्मानित पत्रकार को घृणा शोभा नहीं देती। घृणा के आधार की गयी पत्रकारिता विचारों की हत्या है। आपने अपने लेख में विचारों के हत्यारे के भाव से लिखा है। प्रगतिशीलों के प्रति आपकी घृणा देखकर संपादक ओम थानवी के संपादकीय विवेक पर भी तरस आ रहा है कि बिना किसी प्रमाण के इस तरह का अनर्गल लेख उन्होंने कैसे छाप दिया। 

राव साहब,आपके लेख को देखकर यही महसूस हो रहा है आपका प्रगतिशील विरोधी बुखार काफी बढ़ा हुआ है। प्रगतिशील लेखक संघ और उससे जुड़े कुछ लेखकों ने सत्ता के हित में जो किया उसके आधार समूचे प्रगतिशील लेखन का मूल्यांकन करना सही नहीं होगा। लेखकों का मूल्यांकन उनकी रचनाओं के आधार पर किया जाना चाहिए उनकी सांगठनिक सदस्यता के आधार पर नहीं। लेखक अपनी रचना और उसमें व्यक्त नजरिए से पहचाना जाता है। 

राव साहब ने लिखा है- "ये कथित प्रगतिवादी, जनवादी, अंध-मार्क्सवादी असहिष्णु हैं।" इस बयान के लिए उनके पास एकाध घटिया किस्म के उदाहरण भी हैं। असल में पत्रकारिता में रहते हुए और सत्ता के संस्थानों की मलाई खाते-खाते झाडूमार विवेक पैदा हो जाता है। ये झाडूमार विवेक राव साहव की सबसे बड़ी पूंजी है। 

राव साहब ने अपने अंध कम्युनिस्ट विरोध की झोंक में कुछ सवाल उठाए हैं देखें सच क्या है- "क्या प्रगतिवादी सीना ठोंक कर कह सकते हैं कि वे हमेशा भारत हितकारी भावना संजोते रहे हैं? बेचारी तसलीमा नसरीन पर कट्टरवादियों के हमले पर साजिशभरी खामोशी क्यों बनाए रहे?" पहली बात यह कि तसलीमा पर कभी खामोशी नहीं रही है। जनसत्ता अखबार में मैंने स्वयं तसलीमा की किताब पर पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा पाबंदी लगाए जाने के विरोध में तत्काल विस्तार से बड़ा लेख लिखा था ,मैंने जब लेख लिखा था मैं जनवादी लेखक संघ की कोलकाता जिला शाखा का महासचिव था। मैं माकपा में भी था। मेरी तरह और भी अनेक लेखक हैं जिन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी पर हुए हमलों के खिलाफ हमेशा आवाज बुलंद की है और हमेशा प्रगतिशील कदमों का समर्थन किया है। यदि किसी मसले पर प्रगतिशील लेखकों की राय मीडिया में नहीं दिखती तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वे प्रतिक्रियावादी विचारों का समर्थन कर रहे हैं। मीडिया में प्रगतिशीलों के विचार न दिखने का बड़ा कारण है मीडिया की प्रगतिशीलों में दिलचस्पी का अभाव। मीडिया के लोग जब भी प्रगतिशील लेखकों से साहित्य-संस्कृति के किसी भी मसले पर राय मांगते हैं वे अमूमन उदार राय जाहिर करते हैं। प्रगतिशील लेखन की बुनियादी शर्त है उदार और सहिष्णु नजरिया। 

राव साहब यह आपके अंध-कम्युविस्ट विरोधी नजरिए से निकला काल्पनिक सोच है कि प्रगतिशील असहिष्णु होते हैं। असहिष्णु और अनुदार होकर प्रगतिशील-जनवादी साहित्य नहीं लिखा जा सकता। यह सच है कि प्रगतिशील लेखक संपादक के भांड नहीं होते,जबकि अंध-कम्युनिस्ट विचारधारा में नहाए पत्रकार ,संपादक के इशारों पर नाचने वाले शब्द-नर्तक और जलेबीवीर होते हैं। 



vvv
तंग बस्ती के बच्चों के शिविर में सम्प्रेषण की कला पर बातचीत करते हुए विशेषज्ञ श्री गोविन्द अग्रवाल। पिछले 12 वर्षों से वे यह कार्य कर रहे हैं। उनकी क्लास न सिर्फ बच्चों को बल्कि हम बढों को भी काफी कुछ सिखाने मे सफल रही है। शिविर का आज तीसरा दिन था।

Sunday 9 August 2009

सत्येन्द्र भाई की खरी खरी

पेशे से इंजीनियर सत्येन्द्र भाई मस्त मौला इंसान हैं। ्मध्य प्रदेश के गुना में रहते हैं…खरी खरी कहते हैं और खोटी के एवज़ में ठहाके लगाते हैं। कभी बड़ी शानदार कवितायें लिखी फिर पता नही क्यों छोड़ दीं। पढ़ते अब भी खूब हैं पर कलम से मानो दुश्मनी हो गयी। कविता के अद्भुत पारखी।
तो हमने कहा भाई न सही कलम…की बोर्ड ही सही लिखो तो…

उम्मीद है हम दोस्तों की महफ़िल में गूंजने वाली खरी खरी अब आप सब तक पहुंचेगी।

आपका
अशोक कुमार पाण्डेय